हर चुनाव में
वादों की नई बारिश होती है,
सपनों के बड़े-बड़े पोस्टर लगते हैं,
और जनता
फिर उम्मीद करना सीख जाती है।
नेता मंच से कहते हैं —
“देश बदल देंगे।”
लेकिन चुनाव खत्म होते ही
सबसे पहले
उनकी भाषा बदल जाती है।
जनता हर बार
विश्वास करके हारती है,
फिर भी
लोकतंत्र पर भरोसा नहीं छोड़ती।
क्योंकि उसे उम्मीद रहती है
कि शायद
एक दिन
कोई नेता सच में
जनता का दर्द समझेगा।
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