1) कहते हैं उनको “कॉकरोच”, पर वो चुप रहने वाले नहीं, जिनको तुमने छोटा समझा, वो अब झुकने वाले नहीं। नारे गूँजे हँसी के साथ, सवाल चले सियासत पर वार, “रोटी, नौकरी, सपने दो, भाषण का बोझ न दो यार।” 2) ये दौर अजीब कहानी है, मीमों में भी क्रांति आनी है, कल तक जो मज़ाक लगे थे, आज वही जनता की जुबानी है। कॉकरोच जनता पार्टी शायद, सिर्फ़ एक ट्रेंड नहीं होगी, अगर 'जसु' युवा सच में बोल पड़े, आवाज़ सिंहासन हिलाने को होगी।
रसोई की आँच अब धीरे-धीरे जलती है, क्योंकि गैस का सिलेंडर घर में आने से पहले जेब का वजन पूछता है। माँ आज भी मुस्कुराकर खाना परोसती है, लेकिन उसकी थाली में सब्ज़ी कम चिंता ज़्यादा होती है। बच्चे पूछते हैं — “आज मिठाई क्यों नहीं बनी?” और पिता अख़बार के पीछे अपनी मजबूरी छुपा लेते हैं। महंगाई सिर्फ बाज़ार में नहीं बढ़ती, यह इंसान के भीतर धीरे-धीरे उम्मीद भी कम कर देती है।
सीमा पर खड़ा सैनिक जब बंदूक उठाता है, तब उसके मन में सिर्फ देश होता है। उसे यह नहीं पता कि शहरों में लोग जाति और धर्म के नाम पर एक-दूसरे से लड़ रहे हैं। देश की असली ताकत हथियारों में नहीं, लोगों के विश्वास में होती है। जब नागरिक आपस में टूटने लगते हैं, तब दुश्मन को हमला करने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती। देश नक्शे से नहीं, एकता से मजबूत बनता है।
आज का समाज बहुत तेज़ भाग रहा है, लेकिन किसी को नहीं पता कि मंज़िल कहाँ है। हर हाथ में मोबाइल है, हर चेहरे पर मुस्कान की फोटो है, फिर भी अंदर से लोग टूटे हुए दिखाई देते हैं। रिश्ते अब ज़रूरत के अनुसार बदलते हैं, और सच्चाई अक्सर मज़ाक बन जाती है। हमने बड़े शहर बना लिए, लेकिन छोटा दिल आज भी नहीं बदल पाए। समाज तब सुंदर होगा जब आदमी दूसरे की तकलीफ़ को अपनी तकलीफ़ समझेगा।
एक युवक सालों तक पढ़ाई करता है, रातों की नींद छोड़कर अपने भविष्य के सपने सजाता है। लेकिन जब नौकरी नहीं मिलती, तब उसकी आँखों में धीरे-धीरे आत्मविश्वास मरने लगता है। घर वाले पूछते हैं — “कुछ काम मिला?” और वह हर बार झूठी मुस्कान पहन लेता है। डिग्रियाँ अब किताबों में बंद हैं, और युवा लाइन में खड़े-खड़े उम्र खो रहे हैं। बेरोज़गारी सिर्फ पैसों की कमी नहीं, यह इंसान के भीतर उम्मीद की हार है।
किसान धरती पर पसीना बोता है, तभी शहरों में रोटियाँ पकती हैं। लेकिन सबसे दुख की बात यह है कि जो आदमी सबका पेट भरता है, वही कई बार खुद भूखा सो जाता है। बारिश अगर ज़्यादा हो जाए तो फसल डूब जाती है, कम हो जाए तो खेत सूख जाते हैं। कर्ज़ का बोझ उसकी पीठ पर धीरे-धीरे पहाड़ बन जाता है। फिर भी किसान हर सुबह खेत जाता है, क्योंकि उसे उम्मीद होती है कि अगली फसल शायद जिंदगी बदल दे।
युद्ध शुरू होने से पहले नेता भाषण देते हैं, झंडे लहराए जाते हैं, और जीत के नारे लगाए जाते हैं। लेकिन युद्ध खत्म होने के बाद कई घरों में सन्नाटा बस जाता है। एक सैनिक की शहादत सिर्फ खबर नहीं होती, वह किसी माँ की दुनिया, किसी बच्चे का सहारा और किसी पत्नी का भविष्य होती है। युद्ध कभी भी पूरी जीत नहीं लाता, वह बस दोनों तरफ थोड़ा-थोड़ा दुख छोड़ जाता है।
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