धीरे-धीरे जलती है,
क्योंकि गैस का सिलेंडर
घर में आने से पहले
जेब का वजन पूछता है।
माँ आज भी
मुस्कुराकर खाना परोसती है,
लेकिन उसकी थाली में
सब्ज़ी कम
चिंता ज़्यादा होती है।
बच्चे पूछते हैं —
“आज मिठाई क्यों नहीं बनी?”
और पिता
अख़बार के पीछे
अपनी मजबूरी छुपा लेते हैं।
महंगाई सिर्फ बाज़ार में नहीं बढ़ती,
यह इंसान के भीतर
धीरे-धीरे उम्मीद भी कम कर देती है।
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