बेरोज़गारी / जसराज बिश्नोई

एक युवक
सालों तक पढ़ाई करता है,
रातों की नींद छोड़कर
अपने भविष्य के सपने सजाता है।

लेकिन जब नौकरी नहीं मिलती,
तब उसकी आँखों में
धीरे-धीरे आत्मविश्वास मरने लगता है।

घर वाले पूछते हैं —
“कुछ काम मिला?”
और वह हर बार
झूठी मुस्कान पहन लेता है।

डिग्रियाँ
अब किताबों में बंद हैं,
और युवा
लाइन में खड़े-खड़े
उम्र खो रहे हैं।

बेरोज़गारी
सिर्फ पैसों की कमी नहीं,
यह इंसान के भीतर
उम्मीद की हार है।

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