कुर्सी कभी उसकी थी/जसराज बिश्नोई

कुर्सी
चुपचाप खड़ी रहती है,
राजनेता
उस पर बैठकर बोलता है।

दोनों का रिश्ता
पुराना लगता है।

राजनेता कहता है
कि वह जनता का है,
पर धीरे-धीरे
कुर्सी उसका घर बन जाती है।

वह वादों से हवा भरता है,
और कुर्सी
उन्हें चुपचाप सुनती रहती है।

समय गुजरता है,
शब्द बदलते हैं,
पर कुर्सी
वैसी ही रहती है—
किसी और का इंतज़ार करती हुई।

राजनेता उतरता है,
तो समझ में आता है
कि कुर्सी कभी उसकी थी ही नहीं;
वह बस
कुछ समय के लिए
उस पर ठहरा था।

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